My Attempt With Hindi !!

हंसल मेहता का अलीगढ

हंसल मेहता का अलीगढ इस अलीगढ से जुदा इसलिए है क्योकि वह ९ फ़रवरी २०१० की घटना को सशक्त आवाज़ देता है ,गम्भीर रूप  से प्रोफेसर सिरास का चरित्र अध्ययन कर ,मानवीय संवेदनाओ  को दर्शाते  हुए फिल्म शुरू होती है |

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    हम लोग को सब कुछ सीमित करने और समेटने की आदत सी हो गयी है भावनाए, प्यार सबको हम शब्दों में समेट  के परखने लगे है बड़ी आश्चर्य की बात है पर कोई किसी की भावना को कैसे परिभाषित कर सकता हैं किसी को उस एहसास  को जीना होगा, समझना होगा । बिना अनुभव किये  या बिना उस भावना को जीने वाले किसी व्यक्ति के साथ वक़्त गुज़ारे किसी भी निर्णय पर पहुचना गलत होता है अपने आप से धोखा है ।आपकी तर्कशीलता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। ये लगाव ,झुकाब या प्यार तीन शब्दों का एहसास कविता के भावनात्मक पहलू जैसा ही होना चाहिए ।सिरास सही कहते है कि  कविता में आने वाले हर शब्द पर ठहराव ले और उसे आत्मसात करे उसका नशा करे और फिर रुके, हर कामा , हलंत, अल्पविराम और उनके पीछे छुपी ध्वनि जो  इस एहसास को समझाने के लिए ही बनी है पर गौर करे  | 

काला रंग हमारे लिए ख़राब इसलिए है कि हमें बचपन से ही बता दिया जाता है । प्रोफेसर सिरास का अपने मित्र के यहाँ जाना और भावनात्मक रूप से उन्हें छू देना उसके बाद उस स्पर्श को उनके दोस्त का साफ़ करना कितना अज़ीब है न ?  एक और दृश्य में सिरास कहते है कि  उनके भाई के बच्चे उन्हें बहुत प्यार करते है क्योकि चिल्ड्रन डोंट जज ! कुछ अचानक नहीं होता सब हम अपने इर्द गिर्द देखते रहते है बिना अपना विवेक का इस्तेमाल किए उसका अनुसरण करते रहते है।  सिरास को अपने आप को उस घटना के बाद लोगो द्वारा जोकर समझना हमारे सामाज का  दुसरे के दुःख और मज़बूरी पर हसना, बीमारी  जैसा ही है जैसे सिग्नल पर दिखने वाले ट्रांसजेंडर के साथ हम करते है । 

अपने कलम से अपने ऑटोग्राफ देना , लता के गाने के साथ खो जाना और गाने के हर शब्द को साथ साथ एहसास करना कितना अद्भुत सा लगता है एकाकीपन शायद वक़्त देता है सीमाओ से परे सोचना का तभी तो कविता बनती है प्रोफ़ेसर सिरास भी अपने एकाकी पन से जन्मे मानवीय संवेदनाओ को गहरी तौर पर  समझने वाले ही शख्स थे ।

जो फैसले आस्था के आधार पर होते है वह कमज़ोर होते है, तर्कहीन होते है भावनाओ को कुचल कर और दमन कर के बनते है तभी तो एक दृश्य में प्रोफेसर सिरास दीपू से कहते है कि धरम समझने वाली चीज़ नहीं है जहा दिमाग लगा आस्था गयी ।  संगम की गहराई में बातो का गहरा होना लाज़मी है दीपू के साथ सेल्फ़ी का दृश्य और ये कहना की  तुम लोग इस शब्द के पीछे क्यों पड़े रहते हो कितना हृदयस्पर्शी है । 

    मनोज वाजपेयी अभिनय शब्द को सार्थक करते है या यू  कहे अपने मुकाम तक पहुचाते है कई दृश्यों की  सजीवता इतनी गहरी है कि  सिर्फ मुह से एक शब्द निकल सकता है ‘उफ्फ ‘ । माथे पर शिकन अाना , कोर्ट में दोनों हाथो को मोड़कर बैठना, चुपचाप सो जाना और अपने पार्टनर के साथ लाइट ओन ऑफ़ करते वक़्त की अभिव्यक्ति कितनी सटीक है ,जो झुकाव और अनुभूति इस तरह के समीकरण में हो सकती है वो मनोज वायपेयी ने पटल  पर सजीव  कर के लोगो को दिखाया है । ये फिल्म इस बात पर भी रोशनी डालती है कि लोगो को हमजिंशी रिश्ते का अर्थ दो लोगो के मध्य सिर्फ यौन इक्छा तक सीमित कर, नहीं देखना चाहिए अपितु इससे  जुड़े  भावनात्मक पक्ष को भी देखा जाना चाहिए जो इन रिश्तो में काफ़ी  सशक्त होता है । साथ ही साथ हमे अपने पूर्वाग्रहों से लड़ना होगा ताकि किसी को अपनी जान से हाथ न धोना पड़े । 

हंसल मेहता की  इस फिल्म का आना वर्तमान परिदृश्य में काफी अहम  हो  जाता  है जब सर्वोच्च न्यायालय ने समलैगिकता से जुड़े मामले की  क्यूरेटिव पेटिशन सुनने को तैयार हुई है । वही दूसरी और अलीगढ के बड़े तबके द्वारा इसका विरोध हास्यपद है ये वही लोग है जो हंसल मेहता को शाहिद के लिए सर आंखो पर बिठाते है और अलीगढ के लिए वहाँ से धक्का  दे कर गिरा देते है बहरहाल हंसल मेहता ने दिल्ली से अलीगढ की दूरी कम कर दी है पास के थिएटर में अलीगढ हो आये पाँव तले  घास  का एहसास वही देखने पर मिलेगा  ।

With loads of love for her.
Beparvah !!!

P.S. I wanted to share this way back because often we judge people without knowing ourselves, because trust me words are sufficient to kill someone who genuinely loves you with all honesty !!!

This is not in continuation of the last post “A walk through the graveyard ” but I will be posting the continuation soon!!

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